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गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुतत्व 1 सहस्त्र गुना कार्यरत रहताहै

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BDN. आषाढ शुक्ल पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा एवं व्यासपूर्णिमा कहते हैं । गुरुपूर्णिमा गुरुपूजन का दिन है । गुरुपूर्णिमा का एक अनोखा महत्त्व भी है । अन्य दिनोंकी तुलनामें इस तिथिपर गुरुतत्त्व सहस्र गुना कार्यरत रहता है । इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्तिद्वारा जो कुछ भी अपनी साधना के रूपमें किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है ।

*गुरु के प्रति त्याग का महत्त्व*

किसी विषयवस्तु का त्याग करनेसे उसके प्रति व्यक्तिकी आसक्ति घट जाती है । तन के त्यागसे देहभान भी क्षीण होता है एवं देह ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण कर पाती है । मन के त्यागसे मनोलय होता है तथा विश्वमनसे एकरूपता साध्य होती है । बुद्धि के त्यागसे व्यक्तिकी बुद्धि विश्वबुद्धिसे एकरूप होती है तथा वह ईश्वरीय विचार ग्रहण कर पाता है । त्याग के माध्यमसे गुरु व्यक्ति के लेन-देन को घटाते हैं । तन, मन एवं बुद्धि की तुलनामें धन का त्याग करना साधक तथा शिष्य के लिए सहज सुलभ होता है ।

त्याग के संबंधमें कहा जाए, तो गुरु को कितना धन अर्पण किया है इसकी अपेक्षा अपने पास कितना धन शेष रखा है, यही महत्त्वपूर्ण होता है । जैसे कोई व्यक्ति एक लाख रुपयोंमेंसे दस हजार रुपए अर्पण करे एवं दूसरा व्यक्ति पचास रुपयोंमेंसे सारे पचास रुपए गुरु को अर्पण करे, तो इसमें पूरे पचास रुपए अर्पण करने का महत्त्व अधिक है । अंतमें गुरु के चरणोंमें शिष्य को अपना सर्वस्व अर्पण करना होता है । ऐसा करनेकी सिद्धता होनी चाहिए । सत्सेवा करनेसे तन का त्याग होता है, नामजप करनेसे मन का त्याग होता है, तथा बुद्धि का उपयोग कर गुरुकार्य भावपूर्ण एवं परिपूर्ण करनेसे बुद्धि का त्याग होता है । आप भी किसी संत, गुरु अथवा आध्यात्मिक संस्था द्वारा आयोजित गुरुपूर्णिमा महोत्सवमें सहभागी होकर तन, मन, बुद्धि एवं धन का यथासंभव त्याग कीजिए तथा गुरुतत्त्व का पूरा लाभ ग्रहण कीजिए ।

*गुरुपूर्णिमा का अधिकाधिक लाभ ग्रहण करने के लिए आवश्यक प्रयास*

१. गुरुमंत्र का अथवा कुलदेवता का अधिकाधिक नामजप करना
२. गुरुपूर्णिमा महोत्सवमें सम्मिलित होकर अधिकाधिक सत्सेवा करना
३. सेवा के अंतर्गत प्रत्येक कृत्य भावपूर्ण एवं परिपूर्ण होने के लिए प्रार्थना तथा कृतज्ञता व्यक्त करना
४. गुरुकृपा पाने के लिए आवश्यक गुण तीव्र मुमुक्षुत्व अर्थात गुरुप्राप्ति के लिए तीव्र उत्कंठा, आज्ञापालन, श्रद्धा एवं लगन बढाने का दृढ संकल्प करना
५. गुरुकार्य के लिए धन अर्पण करना
६. गुरु को अपना सर्वस्व अर्पण कर देना ही खरी गुरुदक्षिणा है, यह ध्यानमें रखना तथा वैसे कृत्य करने के लिए प्रयास करना
७. गुरुपूर्णिमा महोत्सवमें सम्मिलित होने के लिए अन्य व्यक्तियों को प्रेरित करना.

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