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अराधना का केंद्र रहा है औरंगाबाद का सूर्य मंदिर

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बिहार के औरंगाबाद जिले का देव सूर्य मंदिर सूर्योपासना के लिए सदियों से आस्था का केंद्र बना हुआ है। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से विश्व प्रसिद्ध त्रेतायुगीन इस मंदिर परिसर में प्रति वर्ष चैत्र और कार्तिक माह में महापर्व छठ व्रत करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है।
बिहार के औरंगाबाद जिले से करीब 20 कि.मी. दूर स्थित देव का सूर्य मंदिर है। यह अपने अप्रतिम सौंदर्य एवं शिल्प के कारण सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं सैलानियों, इतिहासकारों, अन्वेषणकर्ताओं, वैज्ञानिकों, मूर्तिकारों के आकर्षण का
केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर की सबसे खास बात जो लोगो को आकर्षित करती है वह है कि यह मंदिर पूर्वाभिमुख ना होकर पश्चिमाभिमुख है,
कहते हैं हिन्दुओं के महा पर्व छठ पूजा की शुरुआत भी यही से हुई थी।

देव सूर्य मंदिर औरंगाबाद का निर्माण किसने करवाया :
मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार बारह लाख सोलह हजार वर्ष त्रेता युग के बीत जाने पर इला पुत्र पुरूरवा आयल ने इसका निर्माण आरंभ किया। शिलालेख से पता चलता है कि सन् 2019 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माणकाल के दो लाख पचास हजार वर्ष से अधिक हो गए।

यह मंदिर एक सौ फीट ऊँचा है। देव के मंदिर में सात रथों में सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियाँ अपने तीनों रूपों में विद्यमान है- उदयाचल प्रात: सूर्य मध्याचल मध्य सूर्य एवं अस्ताचल अस्त सूर्य।
त्रेता युग बीत जाने पर इलापुत्र आयल ने इसका निर्माण आरंभ किया। मंदिर के निर्माण के बारे में अनेक प्रकार की किंवदंतियाँ हैं, लेकिन निर्माण के संबंध में अब तक भ्रामक स्थिति बनी हुई है। सूर्य पुराण की सर्वाधिक प्राचीन जनश्रुति के
अनुसार एक राजा आयल थे, जो किसी ऋषि के शाप से श्वेत कुष्ठ से पीड़ित थे। राजा आयल एक बार जंगल में शिकार करते हुए वह देव के वन-प्रांतर में पहुँचे और रास्ता भूल गए। भूखे, प्यासे राजा आयल भटक रहे थे कि उन्हें एक छोटा सा
सरोवर दिखाई पड़ा, जिसके किनारे वे पानी पीने गए और अंगुली में पानी भर भरकर पीया।

पानी पीने के क्रम में ही वे घोर आश्चर्य में डूब गए क्यों कि जिन जिन जगहों पर पानी के छींटे पड़े, उन-उन जगहों पर श्वेत दाग जाते रहे थे। इससे प्रसन्न होकर राजा अपने वस्त्रों की परवाह किए बिना सरोवर के गंदे पानी में लेट गए और कहा जाता है कि उनका श्वेत कुष्ठ पूरी तरह जाता रहा। राजा चंगे हो गए।

राजा आयल अपने शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देख प्रसन्न होकर उसी वनप्रांतर में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया। रात्रि राजा में आयल को स्वत: दिखाई दिया कि उसी सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी पड़ी है, जिसे निकालकर वहीं मंदिर बनवाकर उसमें प्रतिष्ठित करने का निर्देश उन्हें स्वप्न में प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि राजा ने इसी निर्देश के अनुसार सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्यकुंड का निर्माण कराया।

मंदिर निर्माण के संबंध में एक कहानी यह भी प्रचलित है कि इसका निर्माण एक ही रात में भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों किया था। इसके काले पत्थरों की नक्काशी अप्रतिम है।

दूसरी किंवदंती हमें यह बताती है कि औरंगजेब जब विभिन्न स्थानों की मूर्तियाँ तोड़ता और मंदिरों को नष्ट करता हुआ यहाँ आ पहुंचा तथा उसने भगवान सूर्य के मंदिर को तुड़वाने एवं मूर्ति उखाड़ने का प्रयास किया तो श्रद्धालु भक्तों एवं देव मंदिर के पुजारियों ने उससे विनती की कि वे इस मंदिर को न तोड़ें। यहाँ के भगवान का बहुत बड़ा माहात्म्य है।

इस पर औरंगजेब जोर से हँसा और उसने धमकी दी कि यदि इस भगवान में सचमुच शक्ति है तो रात भर में प्रवेशद्वार पूरब से पश्चिम हो जाए, तो मैं सत्यता के सामने नतमस्तक होऊँगा, अन्यथा सवेरे मंदिर
को ध्वस्त कर दूँगा ।

भगवान सूर्य ने भक्तों की लाज रख ली और रात भर में ही एका एक प्रवेशद्वार पूरब से पश्चिम हो गया जो आज भी देखा जा सकता है। सवेरे औरंगजेब को जब यह खबर मिली तो वह सचमुच नतमस्तक होकर लौट गया।

देव सूर्य मंदिर की महिमा :
इस मंदिर की महिमा को लेकर लोगों के मन में अटूट श्रद्धा एवं आस्था बनी हुई है। यही कारण है कि हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में पंद्रह से बीस लाख लोग विभिन्न प्रांतों से यहाँ आकर भगवान भास्कर की आराधना-पूजन करते है ।

इस मंदिर के संबंध में यह किंवदंती है कि एक बार एक चोर मंदिर में आठ मन वजनी स्वर्ण कलश चुराने आया। वह मंदिर पर चढ़ ही रहा था कि उसे कहीं से गड़गड़ाहट की आवाज सुनाई दी और वहीं पत्थर बनकर मंदिर से सटकर रह गया, किंतु जनश्रुतियाँ जो भी हों, इस मंदिर की प्रसिद्धि सर्वत्र व्याप्त है।

इस तरह यह मंदिर भगवान सूर्य के आराधनास्थल के साथ-साथ कलात्मक शिल्प का एक अनूठा नमूना भी है।

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