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गदहा जुलूस से इनकार नहीं, गर सभापति चुनाव में पैसे का खेल चला तो

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विजय कुमार, रक्सौल 

रक्सौल नगर परिषद के नये सभापति और उपसभापति का निर्वाचन शुक्रवार को होना है. इस बार भी शहर के कुछ नागरिक इस मूड में है कि सभापति व उप सभापति के चुनाव में पैसे का खेल चला तो शहर में बिकाऊ वार्ड पार्षदों के नाम से गदहा जुलूस निकाला जायेगा. पिछले सभापति और उप सभापति के चुनाव में पैसे के खेल के बाद बिकाऊ वार्ड पार्षदों के नाम से निकाले गये गदहा जुलूस का पूरा शहर गवाह बना था.

गत चुनाव में रक्सौल के प्रधान पथ पर गदहा जुलुस निकालकर स्थानीय बुद्धिजीवियों व युवकों ने अपने पार्षदों का जमकर मजाक उड़ाया था व गदहे के पीठ व कपाल पर बिकाऊ होने के पोस्टर भी चस्पाये थे. कुछ की बोलिया इस साल भी लगी है परन्तु प्रतिरोध करनेवाले के रोल बदल गए है. चर्चा है कि भ्रष्टाचार का विरोधी खेमा भी किंगमेकर की भूमिका में है. अब देखना है कल शुक्रवार के दिन किसके सिर पर नगर सभापति-उपसभापति का ताज होता है हालाँकि चुनावी परिदृश्य साफ होने लगा है.

रक्सौल-नगर परिषद के सभापति-उपसभापति के चुनाव को लेकर पार्षदों के खरीद-फरोख्त की बाजार गर्म रही।राजनीति के गलियारे में भले ही कोई कुछ खुलकर बोलने को तैयार नही है ।बावजूद,बोलियाँ तो लगी है इसे भी कोई पचाने को तैयार नही है।आखिर राजनीति के इस शह व मात के खेल में कौन बिका व किसने खरीदा,शहर वासी बखूबी इस बात से वाकिफ है।पार्षदों के लिए नगर परिषद के सभापति-उपसभापति का चुनाव एक अवसर के रूप में आता है जिसे नवनिर्वाचित कुछ पार्षद इसे खोना नही चाहते।सैर-सपाटे के साथ पर्यटक स्थलीय भ्रमण का दौर,वह भी निःशुल्क अधिकांश लोग गवाना नही चाहते।लोकतंत्र के इस सियासी खेल में क्रॉस वोटिंग का अंदेशा भी खूब रहता है। इसके बाद भी ऊँची रसूख व पहुंच की बदौलत प्रत्याशी खूब रिस्क झेलते है।

 नगर परिषद के पार्षदों का चुनाव समाप्त होने के बाद से ही लगातार नौ जून को होने वाले सभापति और उप सभापति के चुनाव के लिए सरगर्मियां काफी तेज थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव की घड़ियां नजदीक आ रही है, दोनों पदों के उम्मीदवारों की स्थिति साफ होती जा रही है.राजनीतिक हल्के में यह तय सा माना जा रहा है कि पूर्व सभापति उषा देवी दुबारा सभापति की कुर्सी पर काबिज होंगी।वहीं,उपसभापति पद के लिए काशी नाथ प्रसाद के नाम की चर्चा तेज है।हालाकि, यहां  पार्षद रोहिणी शाह गुट अंतिम समय तक बाजी को अपने पाले में करने की जुगत में है।खेमेबाजी कायम है।यही रात अंतिम,यही रात भारी के तर्ज पर शह-मात का शतरंजी खेल जारी है। वैसे,निकाय चुनाव समाप्त होने के बाद से ही नगर परिषद की कुर्सी के लिए अलग-अलग गुटों द्वारा जोड़-तोड़ किया जा रहा था।लेकिन चुनाव के नजदीक आते ही जैसी स्थिति बनी है उसके अनुसार अब नगर परिषद सभापति का चुनाव निर्विरोध होने की संभावना प्रबल होती जा रही है. यदि ऐसा होता है तो समझिए रक्सौल नगर परिषद एक नया इतिहास रचने की ओर अग्रसर है.नगर परिषद के इतिहास को देखें तो,यहां कुर्सी के लिए घमासान और खरीद फरोख्त बिहार में एक अलग रिकॉर्ड बनाता रहा है।कहा जाता है कि नगर परिषद की कुर्सी की कीमत की तुलना में विधानसभा का चुनाव भी सस्ता है।इस बार भी स्थिति इससे अछूती नही है।पर,युवाओं की जीत और सकरात्मक राजनीति ने हवा का रुख बदला है।दर्जन भर पार्षद ऐसे थे ,जिन्हें जमीर और जनता की चिंता ज्यादा थी।इसलिए पार्षदों को देख देख कर आंकड़े बनाये बिगाड़े जा रहे थे।जहां,तक निर्विरोध चुनाव का सवाल है उसमे पैसे के खेल से ज्यादा रचनात्मकता व जनदवाब अहम दिख रहा है।पक्ष विपक्ष फूँक फूँक कर कदम बढ़ा रहे हैं।अच्छा व कुछ कर दिखाने की चाहत जेहन में है।कुर्सी की ओर बढ़त बनाए दिख रहा गुट सबका साथ सबका विकास की नीति पर बढ़ता दिख रहा है।,तो,विपक्ष ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ की होड़ से निकल कर शहर के हित मे दवाब की राजनीति की ओर कदम बढ़ाता दिख रहा है।एक सच यह भी हो सकता है कि यदि इस खेल में तीसरा खेमा बना होता,तो,नजारा बदलता।रक्सौल नगर परिषद के कुर्सी के खेल में युवा व नए चेहरे की असरदार है। उसके निर्विरोध चुनाव के हालात यदि बनते है,तो,यह तय मानिए कि यहां के दिग्गज अपनी शान के नाम पर हॉर्स ट्रेडिंग के शिकार हो कर शोषण का शिकार नही बनना चाहते थे। जिस तरह से पिछले दो बार मध्यवधि मे चेहरे बदले गए।ठगी हुई।उसने सबक सिखा दिया।दोनो ही बार आजिज सभापतियों ने मैदान छोड़ दिया था।पिछली बार मध्यावधि में रेणु गुप्ता निर्विरोध सभापति चुन ली गई।इस बार उनकी हार ने कुर्सी के खेल की तस्वीर को बदल दिया।इसी तरह नगर परिषद के प्रथम अध्यक्ष ओमप्रकाश गुप्ता के पतोहु मनीषा गुप्ता की पराजय ने इस चुनाव में कुर्सी के रास्ते आसान कर दिए।पिछली दफे उषा देवी की प्रतिद्वंदी रही पार्षद अमूल नेशा ने इस बार उन्हें समर्थन दे कर मजबूत बना दिया है।यदि बिकाऊ पार्षदों के भाव मे उछाल नही आया,तो,इसके पीछे चुनाव में दिग्गज माने जाने वाले नेताओं की हार इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है.यही कारण था कि जब पार्षदों की “गाड़ी” नेपाल के लिए खुली, तो, “फिक्स सीट” के बाद भी पायदान पकड़ लटकने वालों की कमी नही रही।हालाकि, एक सम्भावना बनी हुई है कि रचनात्मक व निर्विरोध चुनाव के नाम पर उपसभापति पद के लिए जोड़ घटाव हो।पर,बहुमत से ज्यादा की दावेदारी करने वाला खेमा शायद ही इसकी समीक्षा करे।हालाकि, कहते है कि राजनीति में सटीक भविष्यवाणी नही की जा सकती।ऐसे में किस्मत और बाजीगरी शह -मात के खेल में कोई भी गुल खिला सकती है।

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