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अपनी मिट्टी को सींचने में मिलता है संतोषः राठौर

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बीडीएन रिपोर्टर की एक सफल उद्यमी से बातचीत पर आधारित

हर सफल उद्यमी सामाजिक सरोकार के लिए  काम करता है.  समाज के हासिये पर पड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने का काम किया जाता है. दिल्ली को कर्मभूमि बनानेवाले बिहार के सफल उद्यमी संतोष राठौर ने इसी से प्रेरणा लेकर बिहार में एक नयी पहल की. उन्होंने वैशाली जिला के देसरी प्रखंड के 26 महादलित बच्चों के साथ जुड़कर 26 फरवरी 2017 को शिक्षा का अलख जगाने की शुरुआत की. संकल्प लिया कि इस क्षेत्र के महादलित परिवार के बच्चों के कैसे शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाये. उनको स्कूल तक पहुंचाना और साथ ही उनको जो शिक्षा मिले वह बेहतर स्कूल के बच्चों के समान हो. इसकी व्यवस्था की.

देसरी प्रखंड के 26 महादलित बच्चों के साथ शुरू की नयी पहल

वैशाली जिले के देसरी प्रखंड के युवा उद्यमी संतोष राठौर दिल्ली को अपनी कर्मभूमि बना चुके है. कर्मभूमि से साथ पैतृक गांव का कर्ज उतारने की सोच के साथ वंचित समूह के बच्चों के लिए काम शुरू की है.उनको प्रेरित करना और साथ ही उनको शिक्षा प्राप्र करने में आनेवाली समस्याओं का निराकरण करने का काम किया जा रहा  है. संतोष राठौर बताते हैं कि अपनी मिट्टी किसको नहीं खींचती. हर कोई अपने जड़ से जुड़ना और उसको सींचना चाहता है. एक मंजिल पर पहुंचने के बाद तो इस तरह की भावना और मजबूत होती जाती है. कुछ इसी तरह की यादों से लबरेज संतोष सिंह राठौर बताते है कि दिल्ली में संघर्ष करना अच्छा लगा. अब पैतृक गांव और गांववाले बहुत याद आते हैं. एक दिन बादलों को देखकर मन में आया कि कितना अच्छा नियम है प्रकृति का. धरती से पानी लेनेवाले बादल फिर उस पानी को जमीन पर वापस लौटा देते हैं. इससे धरती पर हरियाली लौट आती है. कुछ  इसी तरह से क्या किया जाये. पैतृक गांव के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के बच्चों के उत्थान के लिये काम शुरू की गयी.

संतोष सिंह राठौर बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने दिल्ली से वैशाली आकर कुड़वा गांव के महादलित बच्चों के बीच अलख जगाने का काम शुरू किया. उन्होंने पहले समर्पण फाउंडेशन नामक संस्था बनायी. इस संस्था के माध्यम से क्षेत्र में शिक्षा का अलख जगाने का अभियान शुरू किया गया. इस काम में उनका हाथ गांव के कुछ मित्रों ने बंटाया. इसमें फाउंडेशन के सचिव भगवती शरण के अलावा रीना सिंह, रविरंजन, वीरभद्र सिंह (बालमुकुंद), जीतेंद्र कुमार, मनोज कुमार शामिल थे.  साथ ही गांव की ही एक महिला को शिक्षिका के रूप में रखकर महादलित के 26 बच्चे –बच्चियों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया . साथ ही  उनके लिए शाम की कक्षाओं की व्यवस्था की गयी है. हर दिन संध्या में उनके लिए कक्षाएं आयोजित की जा रही है. गांव में मध्यविद्यालय और उच्च विध्यालय होते हुए भी बच्चे शिक्षा के प्रति उदासीन रहते थे. पांचवी क्लास के बच्चों को अंग्रेजी के अक्षर तक का ज्ञान नहीं है.  उनको स्कूल तक पहुंचाने के लिए स्वयं सेवकों को लगाया .

बच्चों के पढ़ने के लिए प्रेरित करने की दिशा में उनको फाउंडेशन की ओर से  किताबें, कापियां, पेंसिल और डायरी दी. 15 दिनों पर उनका टेस्ट लिया जाने लगा. उनको साफ-सफाई के प्रति जागरुक किया गया. यह कोशिश की जा रही है कि पढ़ाई के प्रति बच्चे और बच्चियों की ललक बनी रहे.  इसके लिए उनको तीन महीने पर पुरस्कृत करने का कार्यक्रम तैयार किया गया है.  शिक्षा के क्षेत्र में उनका पहला प्रयोग सफल रहा. श्री राठौर बताते हैं कि उन्होंने अब इस दिशा में दो और पंचायतों के महादलित परिवारों के 25-25 बच्चे-बच्चियों की टोली तैयार की है. दूसरे चरण में उनके शिक्षा के लिए कार्यक्रम आरंभ करना है. वह बताते हैं कि देसरी प्रखंड के ही आजमपुर पंचायत और भिखनपुरा पंचायत के 25-25 विद्यार्थियों का समूह तैयार हो गया है. अब उनको अप्रैल से शिक्षा-दीक्षा के लिए प्रेरित करने और बेहतर शिक्षा देने के लिए कार्यक्रम आरंभ किया जाये. खुद दिल्ली में उद्यम करनेवाले संतोष सिंह राठौर ने क्षेत्र में युवा और महिलाओं के सहयोग से ऐसी टीम तैयार की है जो इस काम को बखूबी जिम्मेवारी से निभा रहे हैं. वह खुद इन कार्यों की मानिटरिंग दिल्ली से करते हैं. जब भी स्वयं सेवकों द्वारा उनको बुलाया जाता है वह इस काम के लिए वैशाली चले आते हैं.

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